हमें जन्म देने वाली मां कहलाती है ममता की मां, हमारा जन्म सुधारने वाली मां जिनवाणी कहलाती है समता की मां: आचार्य विहर्ष सागर जीशनिवार को होगा वघ्निहरण पाश्र्वनाथ विधान
हमें जन्म देने वाली मां कहलाती है ममता की मां, हमारा जन्म सुधारने वाली मां जिनवाणी कहलाती है समता की मां: आचार्य विहर्ष सागर जी
उदयपुर जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल। श्री आदिनाथ भवन सेक्टर 11 उदयपुर में विराजमान आचार्य विहर्ष सागर जी महाराज के सानिध्य में आदिनाथ भवन सेक्टर 11 में विभिन्न धार्मिक एवं मारंगलिक आयोजनों का होना लगातार जारी है। आदिनाथ दिगंबर जैन चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष पारस चित्तौड़ा ने बताया कि इससे पूर्व बुधवार प्रात: श्रीजी की शांति धारा अभिषेक हुआ। मदन देवड़ा महावीर सिंघवी अशोक शाह सुरेश वखेरिया, अशोक कोठारी, राजेंद्र कोठारी, भूपेंद्र जैन, मधु मदन चित्तौड़ा, पारस सिंघवी कैलाश चित्तौड़ा अर्जुन कोडीया आदि उपस्थित थे। धर्मसभा में दीप प्रज्वलन, आचार्यश्री को शास्त्र भेंट किया गयाइस दौरान मदन देवड़ा, महावीर सिंघवी, अशोक शाह सुरेश वखेरिया, अशोक कोठारी, राजेंद्र कोठारी, भूपेंद्र जैन, मधु मदन चित्तौड़ा, पारस सिंघवी कैलाश चित्तौड़ा अर्जुन कोडीया आदि उपस्थित थे।
पारस चित्तौड़ा ने बताया कि शनिवार को वघ्निहरण पाश्र्वनाथ विधान होगा। विधान के सौधर्म इन्द्र अशोक कुमार कोठारी, धनपति कुबेर राजेन्द्र कोठारी एवं यज्ञ नयक जितेन्द्र चौधरी होंगे।
गुरूवार को प्रात:कालीन धर्मसभा में आचार्य विहर्ष सागर जी महाराज ने उपस्थित श्राावकों को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि जिनवाणी परम औषधि है। इसको सुनने और पढऩे के लिए भी पात्रता होनी चाहिये। जिन वाणी का एक- एक शब्द शेरनी के दूध के समान होता है। उसकी विशेषता होती है कि उसे स्टील, लोहे के या अन्य किसी पात्र में रखोगे तो वह फट जाएगा। शेरनी का दूध हमेंशा सोने के पात्र में ही रखा जाता है, अन्यथा वह फट जाता है। इसी तरह से जो भव्य जीव होगा उसके पास ही जिन वाणी स्थिर रहेगी और उसका लाभ उन्हें मिलेगा, फिर चाहे हमारे जन्म, जरा, रोगोंं को नष्ट करने वाला ही क्यों न हो। जिनवाणी को मां की संज्ञा दी गई है। एक मां जो हमें जन्म देती है वह ममता की मां कहलाती है, जिन वाणी जो हमारा जन्म सुधारती है, वह समता की मां कहलाती है। जिसने समता का रस पी लिया, वह संसार सागर से पार हो जाता है। जिनवाणी जगत कल्ण्यााी है। इसे बिना आलस्य के ध्यान से सुने।
आचार्यश्री ने कहा कि आप मां-पिता, पति, या भाई के साथ रहें, अपनी मति (बुद्धि) को हमेंशा सम्भाल कर रखना। उस पर अपना नियंत्रण रखना। मति कभी भी नहीं बिगडऩी चाहिये। धन बिगड़ जाए, दुकान बिगड़ जाए कोई फर्क नहीं पड़ता है, यह तो वापस आ सकते हैं, इनकी भरपाई हो सकतीहै, लेकिन अगर मति बिगड़ जाए तो उससे होने वाले नुकसान की भरपाई करना मुश्किल होता है। हमारा जीवन ऐसी रोड़ पर चलता है जहाँ चढ़ाव- उतार दोनों मिलते हं, हमें तो सम्भल कर चलना है। क्योंकि याद रखना हमारा अन्तिम स्टेशन मृत्यु ही है। परिस्थिति ऊँची नीची आती रहती है। यह तो जीवन का हिस्सा है। लेकिन इन सबसे बच कर निकला ही तो जीवन है। भगवान श्री रामचन्द्रजी ने अपने पिता के कहने मात्र से 14 साल का वनवास भोगा। किसी से भी कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने जीवन में हमेंशा मर्यादा का पालन किया तभी हम उन्हें पूजते हैं। हमें उनके गुण प्राप्त करने के लिए हमें - वंदे तद्गुर्ण लब्धये को अपनाना होगा तभी हमें भगवान की प्राप्ति हो सकती है।