भारत को आज वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता —प्रो. सुरेश देमन

 भारत को आज  वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता —प्रो. सुरेश  देमन


जयपुर,16,दिसंबर। भारतीय आप्रवासी और विख्यात अर्थशास्त्री प्रो.सुरेश देमन ने कहा है कि भारत में “विकास” को आज लगभग पूरी तरह जीडीपी के साथ समीकृत कर दिया गया है।यह कोई तकनीकी या सांख्यिकीय भूल नहीं, बल्कि एक सुसंगत वैचारिक परियोजना है। जीडीपी अब केवल आर्थिक उत्पादन का सूचक नहीं, बल्कि वर्गीय वर्चस्व को वैध ठहराने का उपकरण बन चुकी है। सरकार चाहे किसी भी  दल की हो, आर्थिक नीति का मूल ढाँचा अपरिवर्तित रहता है,क्योंकि राज्य स्वयं पूँजी-संचय की प्रक्रिया का अंग बन चुका है।

सेन्टर फॉर इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंस,लंदन के निदेशक प्रो.देमन पिंकसिटी प्रेस क्लब में लिट्रेचर ड्रामा फेस्टिवल के अंतिम दिन ‘’इंडिया बनाम भारत’’ सत्र में प्रमुख वक्ता के तौर पर बोल रहे थे। उन्होने कहा कि जब तक विकास की परिभाषा श्रम, वर्ग और सत्ता-संबंधों को केंद्र में नहीं रखेगी, तब तक जीडीपी की वृद्धि लोकतांत्रिक वैधता से वंचित रहेगी।भारत को आज ऐसे वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता है, जो नव-उदारवादी प्रभुत्व को चुनौती दे, राज्य–पूँजी गठजोड़ को बेनक़ाब करे और श्रम को पुनः इतिहास के केंद्र में स्थापित करे। इसके बिना, जीडीपी का यह उत्सव केवल वर्गीय वर्चस्व को  सुदृढ़ करता रहेगा और लोकतंत्र को भीतर से खोखला करता जाएगा।

उन्होने कहा कि किसी भी समाज का केंद्रीय प्रश्न उत्पादन का नहीं, बल्कि उत्पादन संबंधों का होता है। जीडीपी इस प्रश्न को जान बूझकर अदृश्य कर देती है। यह श्रम द्वारा सृजित मूल्य को “राष्ट्रीय उपलब्धि” में बदल देती है। औसत का यह उत्सव असमानता को छिपाने की एक वैचारिक रणनीति है।

पिछले पच्चीस वर्षों में भारत में नव-उदारवादी नीतियों को जिस सहजता और निरंतरता से लागू किया गया है, उसने राज्य की वर्गीय भूमिका को निर्विवाद रूप से उजागर कर दिया है। श्रम क़ानूनों का कमजोर किया जाना, सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण और सामाजिक व्यय में कटौती करना नीतिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक ही वर्गीय तर्क के विभिन्न रूप हैं। राज्य अब मध्यस्थ नहीं, बल्कि पूँजी के पक्ष में खड़ा एक सक्रिय एजेंट है।

उन्होने कहा कि नव-उदारवाद केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक ऐसा आधिपत्य है जो एक वैचारिक प्रभुत्व और सहमति के ज़रिये शासन करता है। जीडीपी-केंद्रित विकास को “जनमानस” के रूप में स्थापित कर दिया गया है। विश्वविद्यालय, मीडिया और थिंक-टैंक इस प्रभुत्व के बौद्धिक उपकरण बन चुके हैं। असमानता को या तो विकास की अस्थायी कीमत बताया जाता है या फिर उसे योग्यता और बाज़ार के “स्वाभाविक” परिणाम के रूप में पेश किया जाता है।

उत्पादन उन क्षेत्रों में केंद्रित है जो उच्च वर्ग की खपत जैसे रियल एस्टेट, वित्तीय संपत्तियाँ और लक्ज़री उपभोग को पूरा करते हैं। ये क्षेत्र पूँजी-गहन हैं और श्रम को न्यूनतम स्तर पर रखते हैं। रोज़गार सृजन यहाँ प्राथमिकता नहीं, बल्कि एक गौण उपोत्पाद है। इसके उलट, श्रम-गहन क्षेत्रों को या तो असंगठित बनाए रखा गया है या जानबूझकर नीति-स्तर पर हाशिए पर धकेला गया है। इसमें पूँजी को कर-छूट, सब्सिडी और नियामक ढील मिलती है; राज्य को बदले में “ग्रोथ” के आँकड़े और राजनीतिक वैधता दी जाती है। इस खेल में श्रमिक वर्ग संरचनात्मक रूप से बाहर कर दिया जाता है, वह न तो  नीति का निर्माता है, न ही उसका वास्तविक लाभार्थी है। बाज़ार को समाज से अलग करने की कोशिश अंततः सामाजिक विनाश की ओर ले जाती है।  जब बाज़ार समाज को तोड़ने लगता है, तो समाज स्वाभाविक रूप से प्रतिरोध करता है। भारत में यह प्रतिरोध कभी श्रमिक आंदोलनों में, कभी किसान संघर्षों में और कभी पहचान-आधारित राजनीति के विकृत रूपों में बिखरा हुआ है। 

प्रो. देमन के अनुसार कोविड महामारी ने इस पूरे ढाँचे की क्रूरता को निर्वस्त्र कर दिया। भारत की  90 प्रतिशत कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में है, लेकिन राज्य ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि महामारी के बाद श्रम शक्ति का वास्तविक ह्रास कितना हुआ। यह अनदेखी आकस्मिक नहीं थी क्योंकि श्रम की क्षति को मापना पूँजी-केंद्रित विकास कथा को असहज बना देता है।समाज के शीर्ष कुछ प्रतिशत की वृद्धि को पूरे देश की प्रगति के रूप में पेश किया गया। यह मात्र सांख्यिकीय सरलीकरण नहीं, बल्कि वैचारिक प्रभुत्व की तकनीक है,जिससे असमानता को प्राकृतिक, अपरिहार्य और राजनीतिक बहस से बाहर रखा जा सके। ###


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