उदयपुर में ‘द मिडवाइफ़्स कन्फ़ेशन’ की स्क्रीनिंग, शिशु‑हत्या से गोदलेने और मानसिक स्वास्थ्य तक पर गहन चर्चा

 उदयपुर में ‘द मिडवाइफ़्स कन्फ़ेशन’ की स्क्रीनिंग, शिशु‑हत्या से गोदलेने और मानसिक स्वास्थ्य तक पर गहन चर्चा  



 


उदयपुर संवाददाता जनतंत्र की आवाज विवेक अग्रवाल। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के यूजीसी सेंटर फॉरवूमेन्स स्टडीज़ में BBC की बहुचर्चित डॉक्यूमेंट्री ‘द मिडवाइफ़्सकन्फ़ेशन’ की विशेष स्क्रीनिंग 12 दिसम्बर को गोल्डन जुबिली गेस्ट हाउसमें आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र‑छात्राएँ, शोधार्थी औरअध्यापक शामिल हुए। अमिताभ पराशर और सैयद अहमद साफी द्वारानिर्देशित यह फिल्म बिहार और पूर्वी भारत के गांवों में दाइयों कीस्वीकारोक्तियों के ज़रिए नवजात बेटियों की हत्या, उन्हें ज़मीन में दबाने, तथा बाद में हुए अपराधबोध और परिवर्तन की यात्रा को सामने लाती है।


 


स्क्रीनिंग में पश्चात चर्चा में डाक्यूमेंट्री के निर्देशक अमिताभ पाराशर, मोनिका आर्य फाउंडर पा लो ना झारखंड, उदयपुर संभाग के बाल सुरक्षासमिति, शिशु ग्रह निरीक्षक, चाइल्ड प्रोटेक्शन कंसलटेंट यूनिसेफ, सुनीताजैन एवं रेणु तिवारी सेवा मंदिर, डॉ नेहा दमानी वकील, एवं निलोफरजतन संस्थान ने अपनी प्रस्तुति दी। वक्ताओं ने बताया कि कैसे कुछ क्षेत्रोंमें गरीबी, अवांछित गर्भ, विवाहेतर संबंध, सामाजिक शर्म और पारिवारिकदबाव के कारण महिलाएँ अस्पताल नहीं जातीं, प्रसव दर्ज नहीं होता औरबाद में वही बच्चे पालना‑गृहों में पहचाने है या अवैध एजेंटों के माध्यम सेबिकने के ख़तरे में पड़ जाते हैं। शिशुओं की बिक्री, नवजातों का अपहरण, चोरी व बेनाम गोद लेने जैसे मामले सामने आए।


 


अमिताभ जी ने दाइयों को सामाजिक संरचना का शिकार बताया औरसही प्रशिक्षण से बदलाव होने और उससे होने वाले परिणाम का उदाहरणभी पेश किया। मोनिका आर्य ने एनसीआरबी २०२३ का डेटा बताते हुएडेटा गैप की ओर इशारा किया कि जहाँ एनसीआरबी २०२३ में ०-१ वर्ष मेंकन्या भ्रूणहत्या के सिर्फ़ एक केस बता रही है वहीं २०२३ में पा लो नासंस्थान उसी अवधि में ५०० से अधिक कन्या भ्रूणहत्या के मामले दर्जकिया है। सरकारी आँकड़ो में ज़मीनी स्तर की हकीकत की इतनी अलगतस्वीर गहन शोध एवं विश्लेषण का विषय है।


 


दर्ज आँकड़ों के हवाले से बताया गया कि केवल उदयपुर ज़िले में ही 177परित्यक्त या संदिग्ध परिस्थितियों में मिले शिशुओं के मामलों में लगभगआधे से अधिक लड़कियाँ थीं, जबकि कई मामलों में सात‑आठ वर्ष कीलड़कियों को भी गोद लेने के नाम पर एकल पुरुषों को सौंपा गया।विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि शिशु संरक्षण के क़ानून और पालना‑गृहव्यवस्था कागज़ पर तो मौजूद है, पर मज़बूत निगरानी, पारदर्शीरजिस्ट्रेशन और नियमित सामाजिक ऑडिट के बिना इनका लाभ ज़मीनपर नहीं पहुँच पा रहा है।


 


दिशा भार्गव ने बताया कि उदयपुर में सबसे ज़्यादा पालना घर में बच्चेआते हैं और उदयपुर प्रथम जिला है जहाँ सबसे ज़्यादा एडॉप्शन भी होरहे है। डॉ नेहा दमानी ने पीसीपीएनडीटी एक्ट और दूसरे क़ानूनीप्रावधानो का ज़िक्र करते हुए सामाजिक तरीकों का हवाला दियाजिसमे भ्रूण परीक्षण के लिए गांवों में मशीने रात में गांव में आ कर भ्रूणपरीक्षण ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से किए जाते रहे हैं। (मशीन रहे ने आवे, राजरात ने जावे) 


 


फिल्म के बाद हुए संवाद में प्रसवोत्तर अवसाद, मानसिक स्वास्थ्य, असुरक्षित यौन संबंध, अवांछित गर्भ और महिलाओं पर ‘लड़का पैदाकरने’ के दबाव को शिशु‑हत्या और तस्करी से गहरे जुड़ा हुआ बतायागया। प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि दाइयों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिएसंवेदनशीलता‑आधारित प्रशिक्षण, सभी गर्भधारण व जन्मों का अनिवार्यपंजीकरण, मानसिक स्क्रीनिंग, तथा गोद लेने की प्रक्रिया में बच्चों कीसुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है, ताकि कोई भीनवजात सिर्फ़ इसलिए मौत या बाज़ार की वस्तु न बने कि वह लड़की है.

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